घृणित कुछ रहा नहीं मेरे लिए
न रहा कुत्सित-कुरुप-गर्हित
अपने-अपने स्व में
सौंदर्यवान रहा सब कुछ।
पापियों के गले में
कंठहार की तरह शोभित रहा पाप
शाप, अभिशप्तों के शीश पर चढ़ा रहा सादर
अंधकार, बाहर-भीतर फैला अपने विस्तार में
नग्नता, दरिद्रता, विरूपता को देता रहा शरण
अपने-अपने स्व में सौंदर्यवान रहा सब कुछ।

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