साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3580
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
आँखें- सपने बग़ैर भग्न खंडहर लगतीं हैं। समय उलूक सा आज बोल रहा। संशय के दरवाज़े खोल रहा। उम्मीदें भी मन को- इक ठगिनी सा ठगतीं हैं। ज़िंदगी मानो बीहड़ हुई है। अलसी का ढेर खोजें सुई है। भयावह रातों में कुंठाएँ क्यों उमगतीं हैं।
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