साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3580
महेन्द्रगढ़, हरियाणा
1992
उसे घर से निकाला घर जिसने संभाला। पढ़े-लिखे बगुलों का काला किरदार है। माया जिन पे चढ़ादी देह अपनी लुटादी। बोलियाँ वे बोलते की पैसा सरदार है। ममता से मिला हल दुवाओं में सदा बल आँचल को भूल कर ढूँढ़ते दुलार है। ज्ञानी ज्ञान दीन हुए भाव अर्थहीन हुए। ब्याज ही चुका दो बेटों मूल का उधार है।
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