साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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अहमदाबाद, गुजरात
1954
जब भी तुझको पढ़ता हूँ लफ़्ज़-लफ़्ज़ से गोया आसमाँ खिला देखूँ एक-एक मिसरे में कायनात का साया फैलता हुआ देखूँ!
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