साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3580
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
महानगर में हमनें घरौंदा बनाया। पर हमें गाँव खेड़ा बहुत रास आया।। ताल, अमराई, मेड़ रही है। पुरवा निगोड़ी छेड़ रही है।। कभी न किसी पे पड़े दुर्दिन का साया। कोलाहल, भीड़ है, दंगे हैं। तनिक सी बात में अड़ंगे हैं।। जाड़े में धूप की ठिठुरती है काया।
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