आदमी टूट जाता है (कविता)

बहुत कुछ टूट जाता है,
छूट जाता है;
जब आदमी
ख़ुद से रूठ जाता है।
एक खालीपन से,
उसका जीवन भर जाता है।
जब वह खो जाता है,
किसी का हो जाता है;
प्यारे सपने लिए,
वह सो जाता है।
भ्रम टूटता है,
जहाँ से वह लूटता है।
बचता तो कुछ भी नहीं,
जब सब कुछ उससे छूटता है।
तब ऑंखे खुलती है,
सत्य से मिलती है।
पर्दा ऑंखो से हटता है,
भ्रम का बादल छटता है।
तब मिलती शांति है,
मन की झिलती भ्राँति है।


रचनाकार : प्रवीन 'पथिक'
लेखन तिथि : 15 दिसम्बर 2026
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