आदमी झुकता वहीं है (कविता)

आदतन आदमी झुकता वहीं हैं,
जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो।
समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है।
हम बीते लम्हों में रुक जाते हैं।
चाहते हैं, वक्त ठहर जाए;
या उन बीते प्यारे पलों में ले चले
जहाॅं से हमें लगा था कि हम यथार्थ जी रहे हैं।
गर! हम बीते क्षणों में जा पाते,
बदल देते उन तमाम ग़लतियों को
जिसके कारण हम
पश्चाताप व आत्मग्लानि का
जीवन ढो रहे हैं।
एक कचोट, एक भँवर
हर क्षण मानस में उठता है।
जब एकांत में हम होते हैं
हमारी आँखें किसी बिंदु पर
केंद्रित हो जाती है।
जहाॅं हमें कुछ नहीं दिखता–
सिवाय एक घने अंधेरे के
और अप्रत्याशित भय मिश्रित चिंता के।


रचनाकार : प्रवीन 'पथिक'
  • विषय : -  
लेखन तिथि : 30 अप्रैल 2026
यह पृष्ठ 67 बार देखा गया है
×

अगली रचना

माशूका


पीछे रचना नहीं है
कुछ संबंधित रचनाएँ


इनकी रचनाएँ पढ़िए

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।

            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें