आदतन आदमी झुकता वहीं हैं,
जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो।
समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है।
हम बीते लम्हों में रुक जाते हैं।
चाहते हैं, वक्त ठहर जाए;
या उन बीते प्यारे पलों में ले चले
जहाॅं से हमें लगा था कि हम यथार्थ जी रहे हैं।
गर! हम बीते क्षणों में जा पाते,
बदल देते उन तमाम ग़लतियों को
जिसके कारण हम
पश्चाताप व आत्मग्लानि का
जीवन ढो रहे हैं।
एक कचोट, एक भँवर
हर क्षण मानस में उठता है।
जब एकांत में हम होते हैं
हमारी आँखें किसी बिंदु पर
केंद्रित हो जाती है।
जहाॅं हमें कुछ नहीं दिखता–
सिवाय एक घने अंधेरे के
और अप्रत्याशित भय मिश्रित चिंता के।

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